अकाल की दूब
दोनों तालाब के पार्श्व भाग में टीले पर बैठे बातें कर रहे थे -
"कल बुआ ने तुम्हें टोपी उड़ाते हुए देख लिया था।"
"तो क्या हुआ?"
"तुम्हारी तरफ न देखने को कहा है।"
"तो क्यों आयी?"
"कोई श्वास लेना भला कैसे छोड़ सकता है?"
"अच्छा, तो मैं श्वास हूँ तुम्हारी?"
"हाँ"
"मृत्यु के बाद तो श्वास बन्द हो जाती है तो क्या मरने के बाद तुम हमसे प्रेम नहीं करोगी?"
"देह मरती है आत्मा नहीं। तुम मेरी आत्मा की प्राणवायु हो मृत्यु के बाद भी हमारा प्रेम अनंतकाल तक आत्मा के बिम्ब की तरह जीवित रहेगा।
"तुम तो दार्शनिकों जैसी बातें करती हो।"
"नहीं तो...अब मैं जा रही हूँ बुआ घर आ रही होंगी।"
उन दोनों का यूँ मिलना और ढेर सारी बातें करना बीरभूम के सभ्य समाज और स्वयं उनके लिए भी एकदम नया था। 18वीं सदी के उत्तरार्द्ध के भारत में ऐसी प्रेम कहानियाँ सामाजिक मान्यताओं और परंपराओं का खुला उल्लंघन थीं। खुशकिस्मती से सुनेत्रा और राघव का प्रेम अभी समाज की दृष्टि में आया नहीं था। यद्यपि अंग्रेजी कपड़ों ने भारतीय बाजारों में निर्णायक घुसपैठ कर दी थी तथापि संस्कृति के मोर्चे पर पश्चिम को अभी भी मान्यताओं के किले तोड़ने थे। तब तक के लिए प्रेम अवैध था और जमाने की नजर में जघन्य अपराध।
सुनेत्रा और राघव का प्रेम इस कठिन समय में भी निरन्तर विकसित हो रहा था दोनों समय के साथ बड़े हो रहे थे दुनिया और इसके नियमों-कायदों को देख समझ रहे थे।
इस बीच बंगाल ने साल 1770 का भीषण अकाल देखा, यह औपनिवेशिक भारत का पहला दुर्भिक्ष था ब्रिटिश कम्पनी की शोषणकारी नीतियों ने इस अकाल को और भी घातक बना दिया। छोटे काश्तकार कम्पनी को लगान देने की स्थिति में नहीं थे दिन में एक रोटी मिल जाए यही बड़ी बात थी। बीरभूम में भी अकाल ने तांडव मचाया हुआ था पश्चिमी बंगाल में यह सर्वाधिक प्रभावित जिलों में था। सुनेत्रा और उसकी बुआ के लिए अब दो वक्त की रोटी मिलना कठिन हो गया था, ऊपर से लगान की समस्या। समय पर लगान न मिल पाने की वजह से अंग्रेजों ने लगान को फिर से बढ़ा दिया अकाल की मार झेल रहे किसानों के लिए अब जीवित रहना लगभग नामुमकिन हो गया।
गौरी देवी के घर में केवल आधा मन चावल बचा था, ऐसे में लगान चुकाना उनके लिए संभव नहीं था इसलिए समस्याओं को कम करने के लिए एक रोज वह शंकरलाल बंधोपाध्याय के घर गयीं। कम्पनी में शंकरलाल की पहचान कुछ गोरे अधिकारियों से थी इसलिए गौरी देवी को उनसे उम्मीदें थीं।
शंकरलाल गौरी देवी के साथ बीरभूम और मुर्शिदाबाद के टैक्स सुपरवाइज़र रोजर हेक के पास गए। हेक ने इलाके का दौरा करके लगान पर विचार करने का आश्वासन दिया। उनके मुर्शिदाबाद से लौटने के 14वें रोज ही लगान अधिकारी सैन्य टुकड़ियों के साथ नलहाटी पहुँचे, साधोपुर समेत नलहाटी के सभी गाँवों में घर-घर तलाशी लेकर बलपूर्वक लगान वसूल की गई। गौरी देवी ने इस अनिष्ट की कल्पना भी न की थी साधोपुर में अब अन्न का एक दाना भी शेष नहीं रह गया था किसानों के पास अब सिवाय मौत की प्रतीक्षा के कुछ भी नहीं था उम्मीद भी नही। रईसों और कंपनी के मुलाजिमों को छोड़कर किसी और के जीवित बचने की कल्पना अब बेमानी थी। गौरी देवी को आत्मग्लानि का अनुभव हो रहा था वो तो हेक के पास मुसीबतों का हल ढूँढने गयी थी, लेकिन रोजर हेक तो पूरे इलाके के लिए आफत की सौगात लेकर आया। गौरी देवी का हृदय पश्चाताप की ज्वाला में दहक रहा था जैसे उनसे कोई अद्वितीय पाप हो गया हो।
सुनेत्रा और राघव आज महीनों बाद मिल रहे थे। तालाब जो सदा जलमग्न रहता था अब उसमें धूल उड़ने लगी थी दूर दूर तक एक तिनके जितनी हरियाली भी दिखाई नहीं देती थी। दोनों तालाब के किनारी वाले टीले पर बैठकर कभी तालाब तो कभी शून्य को निहार रहे थे। काफी देर तक चुप बैठे रहने के बाद राघव ने कुर्ते की जेब से एक सेब निकालकर सुनेत्रा की ओर बढ़ाया, सेब खाकर उसने बोलना चाहा -
"उन लोगों ने एक सेर चावल भी......"
इतना कहकर सुनेत्रा राघव से लिपटकर जोर जोर से रोने लगी।
दो देहों का आलिंगन उम्मीद उगाता है वैसे ही जैसे आकाश से गिरा जल अकाल से सूख चुकी धरा पर दूब उगाता है। सुनेत्रा के हृदय में भी राघव ने एक उम्मीद की दूब उगा दी थी बदले में उसने अपने हृदय में आग भर ली थी समाज सेवा की आग।
साधोपुर के हालात तेजी से खराब होते जा रहे थे गाँव के दक्षिणी छोर पर आज तीन मौतें हुई थी एक तो अधेड़ था बाकी दो बच्चे थे। गाँव में भुखमरी पैर पसार रही थी। कुछ दिन तक गाँव के धनी लोगों ने गरीबों की मदद की, लेकिन बाद में अपनी प्राथमिकताएं सुनिश्चित करने लगे। राघव ने भी इसी विषय पर घर में विद्रोह छेड़ दिया था वह अधिक से अधिक लोगों की सहायता करके उनका जीवन बचाना चाहता था जबकि विजयसेन सामंतवादी सोच के व्यक्ति थे उनका विचार स्पष्ट था - 'सबका अपना जीवन है और सबका अपना संघर्ष।'
राघव अपने पिता से अपने हिस्से की जायदाद मांग रहा था और विजयसेन अपनी दौलत को यूँ समाज सेवा में आहूत होते कतई नहीं देखना चाहते थे। बहस बढ़ती जा रही थी विजयसेन की आवाज तल्ख हो गयी थी। बात बनते न देख राघव तिजोरी की जानिब भागा, विजयसेन ने उसे रोकने का प्रयास किया राघव के हाथ की उंगलियाँ विजयसेन के आँखों में चुभ गयी। आंखों के बचाव में विजयसेन पैरों का संतुलन बनाना भूल गए लड़खड़ाकर विजयसेन छज्जे से नीचे आ गिरे उनकी तत्काल मृत्यु हो गयी। राघव आत्मग्लानि से पागल हो गया। सुबह तक पूरे नलहाटी में विजयसेन बिस्वास की 'हत्या' का समाचार जंगल के आग की तरह फैल चुका था। राघव के बड़े भाई दादा चेतन ने उसे घर से निकाल दिया। राघव की सफाई सुनने वाला बढ़पुरा में अब कोई न था, पूरा नलहाटी उसे पिता का हत्यारा मान चुका था। उसकी आखिरी उम्मीद साधोपुर थी उसे यकीन था सुनेत्रा उसकी बातों को जरूर समझेगी, अतः अर्धविक्षिप्त अवस्था में वह सीधे साधोपुर की ओर चल पड़ा।
साधोपुर की दशा अत्यंत शोचनीय थी। गौरी देवी बिस्तर पकड़ चुकी थी उनके अब गिनती के दिन बचे थे। सुनेत्रा ओसार के खंभे से सिर टिकाए निश्चेष्ट पड़ी थी उसके मुख की आभा लुप्त हो गयी थी, लाल सुर्ख चेहरा अब भूख और उदासी से पीला पड़ चुका था। आँखें पथरीली हो गयी थी उनकी शाश्वत चंचलता का हरण हो गया हो जैसे। राघव को सुनेत्रा की ऐसी दुर्दशा का भान न था। पदचाप का स्वर समीप आते ही सुनेत्रा ने निंद्रा तोड़ी -
"राघव! क्या ये तुम हो?"
"हाँ"
"यहाँ क्यों आये हो?"
"हमारे प्रेम के अक्षय ऊर्जा स्रोत से संबल ग्रहण करने।"
"प्रेम? प्रलय के अंतिम क्षणों तक के लिए प्रेम इस हृदय से निर्वासित हो चुका है, जाओ किसी स्वजन की हत्या करो उसी से तुम्हें ऊर्जा मिलेगी।"
"बाबूजी की हत्या मैंने नहीं की, वह एक भयानक दुर्घटना थी।"
"संपत्ति का विवाद दुर्घटना नहीं स्पष्ट मंशा होती है। चले जाओ, तुम्हें देने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं है शाप भी नहीं।"
राघव के पास साधोपुर में खड़े रहने का अब कोई आशय शेष नहीं बचा था, सुनेत्रा से तिरस्कृत होकर उसने इतना तो जान ही लिया था कि अब आजीवन उसे इस कलंक के साथ ही जीना पड़ेगा। उसके चरित्र पर लगा यह दाग इस जन्म में धुलने से रहा।
इंसानों की बेरुखी से टूटा इंसान पदार्थों में अपनी शांति तलाशता है उन्हें वह अपना सहचर मान लेता है। राघव ने भी शराब को अपना साथी बना लिया, और उसने मरते दम तक राघव का साथ न छोड़ा। दुर्भिक्ष के समय लोग दाने दाने के लिए तरस रहे थे, ऐसे में हर रोज शराब का बंदोबस्त कर पाना उसके लिए बेहद मुश्किल काम था। अब बीरभूम में रहकर राघव को शराब और मौत में से एक को चुनना था।
शनिवार को पूरे बीरभूम में गौरी देवी सहित 43 लोग मरे थे, इन लोगों में राघव भी था या नहीं यह कोई नहीं जानता था।
बुआ का जाना सुनेत्रा के लिए अपार दुःख छोड़ गया था उसका रुग्ण शरीर दिन-ब-दिन कमजोर होता जा रहा था। अकेलापन भूख से भी ज्यादा घातक होता है ये बात सुनेत्रा और उसकी भूख दोनों जानते थे। वह भी अब अपने दिन गिनने लगी थी।
इन्हीं गिनती भरे दिनों के बीच एक दोपहर उसके घर शंकरलाल बंदोपाध्याय पधारे। शंकरलाल भोजन नहीं जतन लाये थे। सुनेत्रा को एक अंग्रेज अफसर की पत्नी की नौकरानी बनकर मेदिनीपुर जाना था बदले में उसे जीवन अर्थात भोजन मिलता। जिन अंग्रेजों ने उसके घर का आखिरी दाना तक लूट लिया था सुनेत्रा को उन्हीं विधर्मियों की चाकरी करनी थी और जीवित रहने के लिए उसे ये समझौता करना ही था।
अगली सुबह मिस एड्रियाना पार्कर की बग्घी मेदिनीपुर के लिए रवाना हो गयी। गोरों की चकाचौंध और ऐश्वर्य भरी दुनिया सुनेत्रा के लिए एकदम विचित्र थी। नियमित भोजन, स्वस्थ वातावरण और मिस पार्कर की उदारता से सुनेत्रा जल्दी ही पहले जैसी हो गयी। उसका सौंदर्य पुनः लौट आया, लेकिन आँखें बेजान और सूखी ही रहीं जैसे उन्हें वीरान रहने का अभिशाप मिला हो।
हर रात की एक सुबह होती है बंगाल की भी हुई। एक लंबी अवधि के बाद भूरे बादल आकाश में फिर से तैरने लगे, बंगाल में जीवन की बरसात हुई। चिड़ियों के कलरव ने वृक्षों को मूर्छा से जगाया। सुनेत्रा साधोपुर वापस लौट आयी। बंगाल फिर से हरा हो गया।
11 जुलाई सन् 1777
स्थान : साधोपुर, बीरभूम।
मूसलाधार बरसात के बीच दरवाजे पर दस्तक होती है।
"कोई है?"
"कौन?" सुनेत्रा उठकर किवाड़ खोलती है।
"मैं रमाकांत। पश्चिम से आया हूँ।"
लाल अचकन पहने 30-32 बरस का वो नवयुवक पहनावे से सिपाही मालूम पड़ रहा था।
"सर्दियों में मराठों के साथ युद्ध में राघव बिस्वास मारा गया। वो अंग्रेजी सेना की पैदल टुकड़ी में मेरा साथी था। मरने से पहले उसने ये कागज आप तक पहुंचाने को कहा था।" कागज सुनेत्रा को थमाकर रमाकान्त चला गया।
सुनेत्रा की आँखों के सामने स्मृतियां दृश्य बनकर घूमने लगी। 'विजयसेन के बेटे ने उनकी हत्या कर दी' और 'मैंने बाबू जी की हत्या नहीं की' जैसी आवाजें उसे विचलित कर रही थीं। बुरे दिनों की सबसे बुरी स्मृतियाँ उसके अंतर्मन में तूफान जगा रही थी। चार तहों में मोड़े गए कागज को खोलने के लिए सुनेत्रा को सारे हृदय का साहस इकठ्ठा करना पड़ा। कागज के अधभिगे टुकड़े पर लिखा था -
"मैंने बाबूजी की हत्या नहीं की"
'विजयसेन के बेटे ने उनकी हत्या कर दी' के स्वर अब सुनाई नहीं दे रहे थे, सुनेत्रा की आंखों में पानी लौट आया था मोतियों को भूमि पर गिराने के बजाय उसने उन्हें हृदय की दूब पर उतार लिया था।
प्रेम कभी नहीं मरता, दूब कभी नहीं सूखती।
©️ धीरेन्द्र मौर्य
बढ़िया लिखे हो...👍
ReplyDeleteजबरदस्त भाई । आगे और अच्छा लिखोगे उसकी अग्रिम बधाई💐
ReplyDeleteKya bat. proud of you
ReplyDeleteJabardast bhai
ReplyDeleteक्या बात है। बहुत खूब
ReplyDeleteBhut badiya Bhai👌👌👌
ReplyDeleteExcellent ♥️
ReplyDeleteBahut badhiya bhai 👍👍👌👌👌
ReplyDeleteKamaal bhaiya ❤️
ReplyDeleteBahut acha likha hai
ReplyDeleteapplause for the visionary!!👏
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