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अकाल की दूब

 साल 1763 की गर्मियों में हैजे से अनाथ हो चुकी सुनेत्रा तीन महीने बाद ही अपनी बुआ गौरी देवी के घर साधोपुर आ गयी थी। बर्दवान में रहते समय उसका दाखिला वहीं एक पाठशाला में हुआ था लेकिन चौथे दर्जे की पढ़ाई के समय माँ-बाप के परलोकगमन के साथ ही उसकी तालीम पर भी ग्रहण लग गया। दिनभर बुआ के साथ घर और खेत के काम करना और उनकी घुड़की सुनना यही अब उसकी दिनचर्या थे। गौरी देवी विधवा थीं सुनेत्रा के आने से जीवन के प्रति उनकी नीरसता में थोड़ी कमी आयी थी। कुछ खेत थे जिसका ज्यादातर टुकड़ा ऊसर था बाकी हिस्से पर सुनेत्रा के साथ मजदूरों की सहायता से खेती करती थी यही उनकी जीविका का इकलौता साधन था।               रोज की तरह आज भी सुनेत्रा जल्दी-जल्दी चूल्हे-चौके का काम निपटाकर तालाब से सटे बगीचे में राघव से मिलने पहुँच गयी। राघव बढ़पुरा गाँव के मुंशी विजयसेन बिस्वास का लड़का था, विजयसेन ईस्ट इंडिया ट्रेडिंग कंपनी में मुनीम थे उनके पूर्वज बीरभूम के पुराने रईसों में थे। पहली बार राघव और सुनेत्रा दुर्गा पूजा के उत्सव में मिले थे और अब दोनों को एक दूजे से स्नेह हो गया था। वैसे...